Monday, January 30, 2017

इच्छाएं



सोमेन्द्र विगत कई वर्षों से लिखते आ रहे हैं। उनकी रचनाओं में एक विचित्र सी सिहरन होती है जो पढ़ते हुए स्पष्ट महसूस की जा सकती है। वो लगातार सरोकारों के लिए लिख रहे हैं। प्रस्तुत हैं उनकी नवीनतम रचनाएं..


एक.

मुझे चाहिए
खिलते फूल,
पहाड़ पर डूबते सूरज को
ताकती भेड़ें,
रेतीले टीले पर अपने एकलौते
टोडीये*को संभालता रैबारी**
पीने जितना पानी,
बच्चे ना रोये उतना दूध,
पीली सरसों
और
शाम को घर लौटते हुए
मुस्कुराता आदमी,
चाहे स्वर्ग तब भी आसमान में रहे।



दो.

स्त्रियां तब भी मात्र उद्देश्य थी
जब नहीं थे लैंस,
एक लक्ष्य थी
जिसे पा सकने की क्रूर इच्छा
जो मिल जाने के बाद दया में बदल जाती।
कला नहीं थी,
कला का साधन थी।
प्रेम नहीं,
अधिकार थी।
आग नहीं,
लकड़ियाँ थी;
लकड़ियाँ कि जिनको कहा जाता रहा
प्रेम की पराकाष्ठा..
और सरसों से लेप कर
धकेल दिया जाता
देवी कहलवाने को।

स्त्रियां
अतिरिक्तता है
वो मिट्टी जो प्रकृति ने
अतिरिक्त रख दी
उसकी छाती पर,
प्रेम जो
प्रकृति ने अतिरिक्त दिया
उसे सभी को देने हेतु,
अतिरिक्त खून
जो स्तनों से दूध बन झरता है,
एक उदास तट पर
रेत है स्त्री
जो चर्चा का विषय नहीं है,
हमारी तुम्हारी
परिभाषाओं से उकताई औरत
मृत्यु से भी तंग आ चुकी है।
उसका सांस लेना अब
थकान है,
जिसमें हमारे प्रति सहानुभूति
सांत्वना और दया है
जिसे भय से भरे हम प्रेम मानते हैं।
आसमान का रंग जब तक नीला है
स्त्री तब तक धकेली जायेगी,

और नारीवादी मेरी जांघें
सहला कर पूछेंगे
कविता लिखते रहने को..


#सोमेन्द्र तालणिया


*टोड़ीया- ऊँट का बच्चा,
**रैबारी- ऊँटों की एक चरवाहा जाति, जो आजकल बस जाति है।

5 comments:

  1. मित्र और छोटे भाई की लिखी कविताएं।

    ReplyDelete
  2. This comment has been removed by the author.

    ReplyDelete
  3. Kuchh bhi likh paya me iski tarif me

    ReplyDelete