सम्बन्धों के श्मशान से

सम्बन्धों के श्मशान से

एक.

जितना बुझता हूँ और दहकता हूँ
एक लाश का बोझ और बढ़ जाता है कन्धों पर,
मेरे सिर सैकड़ों सम्बन्धों की हत्याओं का दोष है..
मैं ही हूँ हज़ारों सम्बन्धियों से एकाकीपन का श्राप प्राप्त..
मैं मणिकर्णिका का वो दीप्त श्मशान हूँ,
जो राग वैराग्य से पृथक है
वो भेद नहीं करता अपने पराये में,
जिसके लिये किसी प्रिय का आना मात्र ईश्वर की इच्छा है
और अप्रिय का आना बस एक घटना..
जिसके लिये जाने का कोई मोल नहीं।

सृष्टि का वो सबसे पहला श्मशान जिसका सीना लगातार दहकता है..
जिनमें उठता है सम्बन्धों का विलाप धुआँ बन निरन्तर..

(०२. १०.२०१७)

दो.

दिल पत्थर पर रखा एक फूल है
तुम आकर इसे छूती हो,
प्यार से सहलाती हो,
कोई रँग चटख चमकता है दूर सलेटी आसमान पर टँके सूरज में..
मैं तारीखों के बीतने की आवाज़ पर उम्र गिनता हूँ..
एक झूठ जो मौत से भी सच्चा लगता है;
अपना लेता हूँ उसे दूसरी दुनिया का जानकर..

ढलती ज़रूरतों से जूझ
मेरे चेहरे की सिलवटें इतिहास की तारीख़ बन जाती हैं..
ईश्वर मेरी किताब के किसी सफ़हे पर दर्ज एक बोल/नाम है,
जिसे रटा जाता रहा होगा
किसी परीक्षा में मात्र उत्तीर्णांक लाने के लिए..
पेड़ से किसी फूल के ज़मीन पर गिरने की आवाज़
मेरी प्रार्थनाओं के स्वर में ढलती है
और दफ़न हो जाती है नैराश्य में हलक़ से उतरे थूक के घूँट के साथ..

मैं बदलना चाहता हूँ सदा से उस शीर्षक तले छपी आँख मूँदे गर्वपूर्ण चेहरों की तस्वीर,
जिनके नीचे लिखा था 'पृथ्वी पर मनुष्यता के प्रवर्तक'..


(०२. १०. २०१७)

#शून्य

Comments

  1. ऐसे परिपक्व लेखन के लिये साधुवाद

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    1. धन्यवाद वकील सा'ब.. :)

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  2. आपकी अभिव्यक्ति अत्यंत शक्तिशाली एवं उच्च कोटि की है। साधुवाद !!

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    1. शुक्रिया बहुत.. :)

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